Bhakti Agadh Anant Original price was: ₹1,599.Current price is: ₹1,199.

Save: 25%

Back to products

Bhakti Agadh Anant

Publisher:
Rajpal and Sons
| Author:
Madhav Hada
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
Publisher:
Rajpal and Sons
Author:
Madhav Hada
Language:
Hindi
Format:
Hardback

Original price was: ₹2,299.Current price is: ₹1,724.

Save: 25%

In stock

Ships within:
7-10 Days

In stock

Book Type

ISBN:
SKU 9789349162167 Category Tag
Category:
Page Extent:
796

भारत में भक्ति की चेतना प्राग्वैदिककाल से निरंतर है। देश के विभिन्न क्षेत्रों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत इसके कई रूप और प्रवृत्तियाँ रही हैं और सदियों से इनमें अंतःक्रियाएँ और रूपांतरण होता रहा है। यह सीमित अवधि का कोई ‘आंदोलन’ नहीं है। यह केवल परलोक-व्यग्र चेतना भी नहीं है-मनुष्य की पार्थिव चिंताएँ भी इसी के माध्यम से व्यक्त हुई हैं। भक्ति-चेतना का साहित्य स्वतंत्रचेता संत-भक्तों का साहित्य है और स्वतंत्रता हमेशा बहुवचन में चरितार्थ होती है, इसलिए यह अपनी प्रकृति में बहुवचन है। देशभाषाओं में इसकी व्याप्ति ने इसको जनसाधारण के लिए सुलभ कर दिया। विडंबना यह है कि संपूर्ण देश में सदियों से मौजूद इस भक्ति-चेतना की, भाषायी वैविध्य और औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसीय पूर्वग्रह के कारण, अभी तक कोई समेकित पहचान नहीं बन पाई है। भक्ति-चेतना को उत्तरभारत में केवल कबीर, तुलसी आदि तक सीमित समझ लिया गया है, जबकि वस्तुस्थिति इससे अलग है। भक्ति का, उत्तरभारत की तुलना में, व्यापक प्रसार दक्षिण में हुआ और उसकी पहुँच उत्तर-पूर्व, कश्मीर आदि क्षेत्रों में भी व्यापक थी। महाराष्ट्र में भी उसकी व्याप्ति का दायरा बहुत विस्तृत था। गुजरात के जनसाधारण में भी उसकी स्वीकार्यता कम नहीं थी। बंगाल, ओड़िशा और असम के संत-भक्तों ने तो उत्तरभारतीय संत-भक्तों को बहुत दूर तक प्रभावित किया। प्रस्तुत संचयन में पहली बार छठी से लगाकर उन्नीसवीं-बीसवीं सदी तक के, देश के सभी क्षेत्रों के संत-भक्तों की रचनाएँ संकलित की गई हैं। आशा है, यह संचयन सदियों से निरंतर और देशव्यापी भक्ति चेतना को समेकित रूप में जानने-समझने में मददगार सिद्ध होगा।

‘‘भारतीय काव्य परंपरा में भक्ति काव्य को, प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में, स्वर्ण युग कहा जाता है। इससे पहले कविता इतनी लोकप्रिय, साधारण जन में व्याप्त, उनके जीवन में लगातार उपस्थित और स्पंदित, उनके सामान्य जीवन की इतनी विविध छवियों-बिंबों-मुहावरों-रूपकों से रची-बसी नहीं हुई थी। महत्त्वपूर्ण यह है कि भक्ति काव्य ने एक ऐसा विशद-विपुल-बहुल काव्यशास्त्र रचा कि सौंदर्य और संघर्ष, समर्पण और प्रश्नवाचकता, आस्था और संदेह के बीच जो पारंपरिक दूरी और द्वैत थे, वे ध्वस्त हो गये, सामाजिक आचार, जातिगत भेदभाव, धार्मिक अनुष्ठानपरकता, आध्यात्मिक वर्जनाएँ आदि का भक्ति काव्य ने अतिक्रमण किया। उसने, भारतीय इतिहास और परंपरा में पहली बार, धार्मिक सत्ता, राजनैतिक सत्ता, संपत्ति सत्ता के बरअक़्स कविता की स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। यह कविता-सत्ता अपने सत्व में, प्रभाव में और व्याप्ति में जनतांत्रिक थी-उसने धर्म, अध्यात्म, सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था आदि का जनतंत्रीकरण किया। वह एक साथ सौंदर्य, संघर्ष, आस्था, अध्यात्म, प्रश्नवाचकता की विधा बनी। यह अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं है। इस नई जनतांत्रिकता में व्यक्ति की इयत्ता और गरिमा का सहज स्वीकार भी था-प्रायः सभी भक्त कवि अपनी रचनाओं में निस्संकोच अपने नाम का उल्लेख करते हैं।’’
-अशोक वाजपेयी

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Bhakti Agadh Anant”

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You have to be logged in to be able to add photos to your review.

Description

भारत में भक्ति की चेतना प्राग्वैदिककाल से निरंतर है। देश के विभिन्न क्षेत्रों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत इसके कई रूप और प्रवृत्तियाँ रही हैं और सदियों से इनमें अंतःक्रियाएँ और रूपांतरण होता रहा है। यह सीमित अवधि का कोई ‘आंदोलन’ नहीं है। यह केवल परलोक-व्यग्र चेतना भी नहीं है-मनुष्य की पार्थिव चिंताएँ भी इसी के माध्यम से व्यक्त हुई हैं। भक्ति-चेतना का साहित्य स्वतंत्रचेता संत-भक्तों का साहित्य है और स्वतंत्रता हमेशा बहुवचन में चरितार्थ होती है, इसलिए यह अपनी प्रकृति में बहुवचन है। देशभाषाओं में इसकी व्याप्ति ने इसको जनसाधारण के लिए सुलभ कर दिया। विडंबना यह है कि संपूर्ण देश में सदियों से मौजूद इस भक्ति-चेतना की, भाषायी वैविध्य और औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसीय पूर्वग्रह के कारण, अभी तक कोई समेकित पहचान नहीं बन पाई है। भक्ति-चेतना को उत्तरभारत में केवल कबीर, तुलसी आदि तक सीमित समझ लिया गया है, जबकि वस्तुस्थिति इससे अलग है। भक्ति का, उत्तरभारत की तुलना में, व्यापक प्रसार दक्षिण में हुआ और उसकी पहुँच उत्तर-पूर्व, कश्मीर आदि क्षेत्रों में भी व्यापक थी। महाराष्ट्र में भी उसकी व्याप्ति का दायरा बहुत विस्तृत था। गुजरात के जनसाधारण में भी उसकी स्वीकार्यता कम नहीं थी। बंगाल, ओड़िशा और असम के संत-भक्तों ने तो उत्तरभारतीय संत-भक्तों को बहुत दूर तक प्रभावित किया। प्रस्तुत संचयन में पहली बार छठी से लगाकर उन्नीसवीं-बीसवीं सदी तक के, देश के सभी क्षेत्रों के संत-भक्तों की रचनाएँ संकलित की गई हैं। आशा है, यह संचयन सदियों से निरंतर और देशव्यापी भक्ति चेतना को समेकित रूप में जानने-समझने में मददगार सिद्ध होगा।

‘‘भारतीय काव्य परंपरा में भक्ति काव्य को, प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में, स्वर्ण युग कहा जाता है। इससे पहले कविता इतनी लोकप्रिय, साधारण जन में व्याप्त, उनके जीवन में लगातार उपस्थित और स्पंदित, उनके सामान्य जीवन की इतनी विविध छवियों-बिंबों-मुहावरों-रूपकों से रची-बसी नहीं हुई थी। महत्त्वपूर्ण यह है कि भक्ति काव्य ने एक ऐसा विशद-विपुल-बहुल काव्यशास्त्र रचा कि सौंदर्य और संघर्ष, समर्पण और प्रश्नवाचकता, आस्था और संदेह के बीच जो पारंपरिक दूरी और द्वैत थे, वे ध्वस्त हो गये, सामाजिक आचार, जातिगत भेदभाव, धार्मिक अनुष्ठानपरकता, आध्यात्मिक वर्जनाएँ आदि का भक्ति काव्य ने अतिक्रमण किया। उसने, भारतीय इतिहास और परंपरा में पहली बार, धार्मिक सत्ता, राजनैतिक सत्ता, संपत्ति सत्ता के बरअक़्स कविता की स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। यह कविता-सत्ता अपने सत्व में, प्रभाव में और व्याप्ति में जनतांत्रिक थी-उसने धर्म, अध्यात्म, सामाजिक आचार-विचार, व्यवस्था आदि का जनतंत्रीकरण किया। वह एक साथ सौंदर्य, संघर्ष, आस्था, अध्यात्म, प्रश्नवाचकता की विधा बनी। यह अपने आप में किसी क्रांति से कम नहीं है। इस नई जनतांत्रिकता में व्यक्ति की इयत्ता और गरिमा का सहज स्वीकार भी था-प्रायः सभी भक्त कवि अपनी रचनाओं में निस्संकोच अपने नाम का उल्लेख करते हैं।’’
-अशोक वाजपेयी

About Author

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Bhakti Agadh Anant”

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You have to be logged in to be able to add photos to your review.

[wt-related-products product_id="test001"]

RELATED PRODUCTS

RECENTLY VIEWED