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Mirza Galib Ke Mashur Sheron Shayri

Publisher:
The Milky Way Publications
| Author:
Mirja Galib
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
Publisher:
The Milky Way Publications
Author:
Mirja Galib
Language:
Hindi
Format:
Hardback

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7-10 Days

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Book Type

ISBN:
SKU 9788199009950 Category
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Page Extent:
168

“मिर्ज़ा ग़ालिब के मशहूर शेर” उर्दू साहित्य के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की चुनिंदा और प्रतिनिधि शायरी का संग्रह है। यह पुस्तक ग़ालिब की गहन दार्शनिक दृष्टि, भावनात्मक गहराई और अद्वितीय काव्य-शैली को सजीव रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें शामिल शेर प्रेम, जीवन, नियति और अस्तित्व जैसे शाश्वत विषयों पर ग़ालिब की सूक्ष्म और प्रभावशाली सोच को उजागर करते हैं।

पुस्तक में संकलित कुछ प्रसिद्ध शेर इस प्रकार हैं—
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।”

“न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होनी ने, न होता मैं तो क्या होता?”

“कितना ख़ौफ़ होता है शाम के अँधेरों में,
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।”

“हाथों की लकीरों पर मत जा ऐ ग़ालिब,
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।”

“इश्क़ पर ज़ोर नहीं है, ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे।”

इन शेरों के माध्यम से मिर्ज़ा ग़ालिब ने मानवीय भावनाओं और जीवन के सत्य को अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी शायरी समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी पाठकों के मन को छूती है और उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है।

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Description

“मिर्ज़ा ग़ालिब के मशहूर शेर” उर्दू साहित्य के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की चुनिंदा और प्रतिनिधि शायरी का संग्रह है। यह पुस्तक ग़ालिब की गहन दार्शनिक दृष्टि, भावनात्मक गहराई और अद्वितीय काव्य-शैली को सजीव रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें शामिल शेर प्रेम, जीवन, नियति और अस्तित्व जैसे शाश्वत विषयों पर ग़ालिब की सूक्ष्म और प्रभावशाली सोच को उजागर करते हैं।

पुस्तक में संकलित कुछ प्रसिद्ध शेर इस प्रकार हैं—
“हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।”

“न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होनी ने, न होता मैं तो क्या होता?”

“कितना ख़ौफ़ होता है शाम के अँधेरों में,
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।”

“हाथों की लकीरों पर मत जा ऐ ग़ालिब,
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।”

“इश्क़ पर ज़ोर नहीं है, ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाए न लगे और बुझाए न बुझे।”

इन शेरों के माध्यम से मिर्ज़ा ग़ालिब ने मानवीय भावनाओं और जीवन के सत्य को अत्यंत संवेदनशीलता और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी शायरी समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी पाठकों के मन को छूती है और उन्हें आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है।

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