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Atulaya Bharat
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Mahatma

Publisher:
Prabhat Prakashan
| Author:
Manu Sharma
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
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Prabhat Prakashan
Author:
Manu Sharma
Language:
Hindi
Format:
Hardback

Original price was: ₹400.Current price is: ₹300.

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24

ये कहानियाँ मेरे उपन्यासों के अंतराल की उत्पाद हैं; पर ये उपन्यास नहीं हैं—न आकार में और न प्रकार में। यद्यपि आज यह बात भी उठ रही है कि कहानी कोई विधा ही नहीं है। जो कुछ है वह उपन्यास ही है। आकार की लघुता में भी वह उपन्यास है—और विशालता में तो है ही। दोनों में कथा-शिल्प एक है। मेरा ‘पात्र’ जिन ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर ले चलता है वहाँ मैं अकेला नहीं होता। एक तो मेरा विवेक मेरे साथ होता है और दूसरे, मेरी कल्पना मेरे साथ होती है। विवेक रेखांकन करता है और कल्पना रंग भरती है। रेखांकन के बाहर उसका रंग नहीं जाता। विवेक कल्पना का नियंत्रण है, ‘पकड़’ है। जब कल्पना रेखांकन के बाहर जाने लगती है या वायवी होने लगती है तब विवेक कहता है, ‘ठहरो, कुछ सोच-विचार करो।’. . . और बाहर जाने की अपनी प्रकृति के बावजूद वह यथार्थ के दायरे में ही रहती है। तब वे चित्र बनते हैं, जिनके कुछ नमूने इस संग्रह में हैं। —लेखक.

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Description

ये कहानियाँ मेरे उपन्यासों के अंतराल की उत्पाद हैं; पर ये उपन्यास नहीं हैं—न आकार में और न प्रकार में। यद्यपि आज यह बात भी उठ रही है कि कहानी कोई विधा ही नहीं है। जो कुछ है वह उपन्यास ही है। आकार की लघुता में भी वह उपन्यास है—और विशालता में तो है ही। दोनों में कथा-शिल्प एक है। मेरा ‘पात्र’ जिन ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों पर ले चलता है वहाँ मैं अकेला नहीं होता। एक तो मेरा विवेक मेरे साथ होता है और दूसरे, मेरी कल्पना मेरे साथ होती है। विवेक रेखांकन करता है और कल्पना रंग भरती है। रेखांकन के बाहर उसका रंग नहीं जाता। विवेक कल्पना का नियंत्रण है, ‘पकड़’ है। जब कल्पना रेखांकन के बाहर जाने लगती है या वायवी होने लगती है तब विवेक कहता है, ‘ठहरो, कुछ सोच-विचार करो।’. . . और बाहर जाने की अपनी प्रकृति के बावजूद वह यथार्थ के दायरे में ही रहती है। तब वे चित्र बनते हैं, जिनके कुछ नमूने इस संग्रह में हैं। —लेखक.

About Author

मनु शर्मा 1928 की शरत् पूर्णिमा को अकबरपुर (अब अंबेडकर नगर), फैजाबाद (उ.प्र.) में जनमे हनुमान प्रसाद शर्मा लेखन जगत् में ‘मनु शर्मा’ नाम से विख्यात हैं। लगभग डेढ़ दर्जन उपन्यास, दो सौ कहानियों और अनगिनत कविताओं के प्रणेता श्री मनु शर्मा की साहित्य-साधना हिंदी की किसी भी खेमेबंदी से दूर, अपनी ही बनाई पगडंडी पर इस विश्‍वास के साथ चलती रही है कि ‘आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परसों नहीं तो बरसों बाद मैं डायनासोर के जीवाश्म की तरह पढ़ा जाऊँगा।’ अनेक सम्मानों और पुरस्कारों से विभूषित श्री मनु शर्मा ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा है; पर कथा आपकी मुख्य विधा है। ‘तीन प्रश्‍न’, ‘मरीचिका’, ‘के बोले माँ तुमि अबले’, ‘विवशिता’ एवं ‘लक्ष्मणरेखा’ आपके प्रसिद्ध सामाजिक उपन्यास हैं। ‘द्रौपदी की आत्मकथा’, ‘अभिशप्‍त कथा’, ‘कृष्ण की आत्मकथा’ (आठ भागों में), ‘द्रोण की आत्मकथा’, ‘कर्ण की आत्मकथा’ तथा ‘गांधारी की आत्मकथा’ आपके पौराणिक उपन्यास हैं। ‘मुंशी नवनीतलाल’ और अन्य कहानियों में सामाजिक विकृतियों तथा विसंगतियों पर कटाक्ष करनेवाले तीखे व्यंग्य हैं। ‘पोस्टर उखड़ गया’ सामाजिक कहानियों का संग्रह है तो अब प्रस्तुत है यह नवीनतम कहानी संग्रह ‘महात्मा’। सम्मान और अलंकरण—गोरखपुर विश्‍व-विद्यालय द्वारा डी.लिट. की मानद उपाधि और उत्तर प्रदेश हिंदी समिति द्वारा ‘साहित्य भूषण’ सम्मान विशेष उल्लेख्य हैं।.

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