धरा के अंक में I Dhara ke ank mein

Publisher:
Jansabha
| Author:
Shweta Upadhyay
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
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Jansabha
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Shweta Upadhyay
Language:
Hindi
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Paperback

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Swadesi

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234

मुंबई की आपाधापी और कार्यस्थल की अदृश्य चुनौतियों से रूठी मुक्ता नौकरी को अलविदा कहना चाहती है; अपने साथी को नहीं। उसके जीवन में रोमांच और अतिरेक का बुलबुला भले ही फूट चुका है, पर विराग के साथ पल्लवित होता प्रेम अब भी हरा-भरा है। यह जानते हुए भी वह अपने घर लौट आती है।
“आखिर क्यों भाग रही है वह एक शहर से? यह महानगर भी तो उसी ने चुना था।”
“क्या विराग महानगरीय ज़िंदगी का अकेलापन झेल सकेगा?”
“क्या संवाद के माध्यम दूरियों का भूगोल मिटा सकेंगे?”
“प्रेम और साथी की अनुपस्थिति में दोनों किसी नए आकर्षण में बंधेंगे या संवाद समाधान बनेगा?”
“जीवन स्पर्श की अनुभूतियों के बिना कैसा होगा?”
“कहीं विडम्बनाओं, सामाजिक मर्यादाओं और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच मुक्ता और विराग का प्रेम लाजवंती का वह पौधा तो नहीं बन गया जो एक स्पर्श से खिल भी उठता है और बुझ भी जाता है!”

अपनी बेचैनियों को सुकून देने जब मुक्ता कान्हा राष्ट्रीय उद्यान पहुँचती है, तो बैगा परिवार का आतिथ्य, जंगल, नदी, लोकजीवन और धरा की आत्मीय मित्रता उसे क्या सिखाएंगे? वनवासी जीवन, धरा की निकटता और एकांत उसे किस नई जीवन-धारा से जोड़ेंगे?
धरा का नेतृत्व स्वीकारने वाली नायिकाएँ क्या स्वयं के लिए आर्थिक स्वायत्तता चुनेंगी, या परंपरागत जीवनशैली की ओर लौटेंगी?

समाधान की खोज के बीच कुछ प्रश्न बार-बार गूँजते रहेंगे—
“क्या प्रेम और स्वतंत्रता साथ नहीं रह सकते?”
“क्या पलायन नई जीवनशैली है?”
“क्या वनवासी समाज परिवर्तन के लिए तैयार है?”

मुक्ता, धरा और विराग—इनके साथ चलने वाला समूह जीवन की नीम-अंधेरी पगडंडियों को पार कर समाधान के मुख्य मार्ग तक कैसे पहुँचेगा? पारिजात के खिलने से लेकर अमलतास के फूलने तक इन किरदारों का सफ़र कैसा होगा, जानने के लिए पढ़ें — “धरा के अंक में”

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मुंबई की आपाधापी और कार्यस्थल की अदृश्य चुनौतियों से रूठी मुक्ता नौकरी को अलविदा कहना चाहती है; अपने साथी को नहीं। उसके जीवन में रोमांच और अतिरेक का बुलबुला भले ही फूट चुका है, पर विराग के साथ पल्लवित होता प्रेम अब भी हरा-भरा है। यह जानते हुए भी वह अपने घर लौट आती है।
“आखिर क्यों भाग रही है वह एक शहर से? यह महानगर भी तो उसी ने चुना था।”
“क्या विराग महानगरीय ज़िंदगी का अकेलापन झेल सकेगा?”
“क्या संवाद के माध्यम दूरियों का भूगोल मिटा सकेंगे?”
“प्रेम और साथी की अनुपस्थिति में दोनों किसी नए आकर्षण में बंधेंगे या संवाद समाधान बनेगा?”
“जीवन स्पर्श की अनुभूतियों के बिना कैसा होगा?”
“कहीं विडम्बनाओं, सामाजिक मर्यादाओं और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच मुक्ता और विराग का प्रेम लाजवंती का वह पौधा तो नहीं बन गया जो एक स्पर्श से खिल भी उठता है और बुझ भी जाता है!”

अपनी बेचैनियों को सुकून देने जब मुक्ता कान्हा राष्ट्रीय उद्यान पहुँचती है, तो बैगा परिवार का आतिथ्य, जंगल, नदी, लोकजीवन और धरा की आत्मीय मित्रता उसे क्या सिखाएंगे? वनवासी जीवन, धरा की निकटता और एकांत उसे किस नई जीवन-धारा से जोड़ेंगे?
धरा का नेतृत्व स्वीकारने वाली नायिकाएँ क्या स्वयं के लिए आर्थिक स्वायत्तता चुनेंगी, या परंपरागत जीवनशैली की ओर लौटेंगी?

समाधान की खोज के बीच कुछ प्रश्न बार-बार गूँजते रहेंगे—
“क्या प्रेम और स्वतंत्रता साथ नहीं रह सकते?”
“क्या पलायन नई जीवनशैली है?”
“क्या वनवासी समाज परिवर्तन के लिए तैयार है?”

मुक्ता, धरा और विराग—इनके साथ चलने वाला समूह जीवन की नीम-अंधेरी पगडंडियों को पार कर समाधान के मुख्य मार्ग तक कैसे पहुँचेगा? पारिजात के खिलने से लेकर अमलतास के फूलने तक इन किरदारों का सफ़र कैसा होगा, जानने के लिए पढ़ें — “धरा के अंक में”

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