Bhitari Banaras

Publisher:
Vani Prakashan
| Author:
Dilip Singh
| Language:
Hindi
| Format:
Hardback
Publisher:
Vani Prakashan
Author:
Dilip Singh
Language:
Hindi
Format:
Hardback

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588
काशी भारतीय संस्कृति की भरी-पूरी मंजूषा है। है काशी के आध्यात्मिक स्वरूप को बूझ पाना आसान नहीं है। यह पुस्तक ‘काशी-रहस्य’ को तीन स्तरों पर उजागर करती है—काशी, शिव और गंगा। इस त्रिवेणी को यहाँ सम्प्रेषणीय और प्रभावी ढंग से पुराणों, हिन्दी साहित्य और किंवदन्तियों के माध्यम से अवतरित किया गया है। इस ‘काशी’ को जाने बिना ‘बनारस’ का भाव-बोध कदापि नहीं हो सकता। ‘बनारस’ के आन्तरिक और बाह्य दोनों स्वरूपों को उकेरने के लिए पुस्तक को कई खण्डों में बाँटकर रचा गया है जिसमें एक ओर बनारस के खान-पान, मेलों-त्योहारों और पान-संस्कृति का लेखक की स्मृतियों में बसा रंग-ढंग मिलेगा तो दूसरी ओर बनारसी घराने की संगीत-परम्परा और बनारसी बोली में कण्ठ-कण्ठ से फूटते लोकगीतों की रसधारा भी प्रवाहित मिलेगी और तीसरी ओर मिलेगा बनारस में मिट्टी के खिलौनों का संसार। यहाँ बनारस के चुलबुले साहित्य की झाँकी भी दिखेगी, रामलीलाओं की राम-रसभीनी तस्वीर भी और बनारसी बोली की ठसक भी। भितरी बनारस बनारस पर एक सर्वसमावेशी पुस्तक है। बनारस को सम्पूर्णता में देखने-दिखाने का यह पुस्तक एक रचनात्मक प्रयास है जिसमें ‘काशी- सत्य’ के साथ-साथ कथा-रस, संस्मरण, रिपोर्ताज और विवरण की शैलियाँ घुली-मिली हैं जिससे इस पुस्तक की रोचकता और भावप्रवणता को पर लग गये हैं। यह चित्रों से भरी ‘कॉफ़ी टेबल’ पुस्तक नहीं है। इसकी प्रकृति या तो शोधपरक है अथवा स्वतः अनुभूत बनारसी भावों का चित्रांकन। चित्र इसमें भी हैं, पर पाठ को सहारा देने के लिए रखे गये हैं। काशी/वाराणसी/बनारस को जानने और कम पहचानने वाले दोनों तरह के पाठकों को यह पुस्तक ‘काशी-रस’ से सराबोर कर देगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। ——- “बनारस कब, किधर से सगरो कतवार को मेरे भीतर घुस आता है, कुछ पते धकियाते हुए नहीं चलता। लगता नहीं कि वह ऐसा करेगा पर कर गुज़रता है। कभी आकर कान में कह जाता है कि-आसिक होकर सोना क्या रे, और जगा देता है, खींच लेता है अपनी ओर। हम एहर-ओहर तमाम करकट सहेजते होते हैं कि कहीं से धड़ाके-से आकर सब बिखेर देता है और चेता जाता है कि- घट-घट दीपक बरै लखै नहिं अन्ध है। मुझे ‘अँधेरे’ से बाहर धकिया देता है और ख़ुद अँणस-उँणसकर मेरे भीतर आ विराजता है। इतना नगीच कि उसकी एक-एक धक-धक सुनाई पड़ने लगती है। उसका ताप मुझे तपाने लगता है। स्वर गूंजने लग जाता है कि मुक्तिदायिनी काशी की गलियों में जी खोलके खरचो–कबीर, तुलसी, रैदास और कीनाराम की तरह। दे डालो सब कुछ, अपने आप को भी। ‘स्व’ को खरचके ख़त्म कर दो। ख़ुदी और ख़ुदा का फ़र्क़ ख़ुद मिट जायेगा।” —इसी पुस्तक से

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Description
काशी भारतीय संस्कृति की भरी-पूरी मंजूषा है। है काशी के आध्यात्मिक स्वरूप को बूझ पाना आसान नहीं है। यह पुस्तक ‘काशी-रहस्य’ को तीन स्तरों पर उजागर करती है—काशी, शिव और गंगा। इस त्रिवेणी को यहाँ सम्प्रेषणीय और प्रभावी ढंग से पुराणों, हिन्दी साहित्य और किंवदन्तियों के माध्यम से अवतरित किया गया है। इस ‘काशी’ को जाने बिना ‘बनारस’ का भाव-बोध कदापि नहीं हो सकता। ‘बनारस’ के आन्तरिक और बाह्य दोनों स्वरूपों को उकेरने के लिए पुस्तक को कई खण्डों में बाँटकर रचा गया है जिसमें एक ओर बनारस के खान-पान, मेलों-त्योहारों और पान-संस्कृति का लेखक की स्मृतियों में बसा रंग-ढंग मिलेगा तो दूसरी ओर बनारसी घराने की संगीत-परम्परा और बनारसी बोली में कण्ठ-कण्ठ से फूटते लोकगीतों की रसधारा भी प्रवाहित मिलेगी और तीसरी ओर मिलेगा बनारस में मिट्टी के खिलौनों का संसार। यहाँ बनारस के चुलबुले साहित्य की झाँकी भी दिखेगी, रामलीलाओं की राम-रसभीनी तस्वीर भी और बनारसी बोली की ठसक भी। भितरी बनारस बनारस पर एक सर्वसमावेशी पुस्तक है। बनारस को सम्पूर्णता में देखने-दिखाने का यह पुस्तक एक रचनात्मक प्रयास है जिसमें ‘काशी- सत्य’ के साथ-साथ कथा-रस, संस्मरण, रिपोर्ताज और विवरण की शैलियाँ घुली-मिली हैं जिससे इस पुस्तक की रोचकता और भावप्रवणता को पर लग गये हैं। यह चित्रों से भरी ‘कॉफ़ी टेबल’ पुस्तक नहीं है। इसकी प्रकृति या तो शोधपरक है अथवा स्वतः अनुभूत बनारसी भावों का चित्रांकन। चित्र इसमें भी हैं, पर पाठ को सहारा देने के लिए रखे गये हैं। काशी/वाराणसी/बनारस को जानने और कम पहचानने वाले दोनों तरह के पाठकों को यह पुस्तक ‘काशी-रस’ से सराबोर कर देगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। ——- “बनारस कब, किधर से सगरो कतवार को मेरे भीतर घुस आता है, कुछ पते धकियाते हुए नहीं चलता। लगता नहीं कि वह ऐसा करेगा पर कर गुज़रता है। कभी आकर कान में कह जाता है कि-आसिक होकर सोना क्या रे, और जगा देता है, खींच लेता है अपनी ओर। हम एहर-ओहर तमाम करकट सहेजते होते हैं कि कहीं से धड़ाके-से आकर सब बिखेर देता है और चेता जाता है कि- घट-घट दीपक बरै लखै नहिं अन्ध है। मुझे ‘अँधेरे’ से बाहर धकिया देता है और ख़ुद अँणस-उँणसकर मेरे भीतर आ विराजता है। इतना नगीच कि उसकी एक-एक धक-धक सुनाई पड़ने लगती है। उसका ताप मुझे तपाने लगता है। स्वर गूंजने लग जाता है कि मुक्तिदायिनी काशी की गलियों में जी खोलके खरचो–कबीर, तुलसी, रैदास और कीनाराम की तरह। दे डालो सब कुछ, अपने आप को भी। ‘स्व’ को खरचके ख़त्म कर दो। ख़ुदी और ख़ुदा का फ़र्क़ ख़ुद मिट जायेगा।” —इसी पुस्तक से

About Author

दिलीप सिंह का जन्म 1951 में काशी के कबीरचौरा मुहल्ले में बाबू गुलाब सिंह एवं सावित्री देवी के यहाँ हुआ। आपने एम.ए. (हिन्दी) तथा एम. फ़िल. और पीएच.डी. (भाषाविज्ञान) की उपाधि प्राप्त करने के बाद केन्द्रीय हिन्दी संस्थान (आगरा), दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा (हैदराबाद, धारवाड़ और चेन्नई केन्द्र), अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडियन स्टडीज़ (वाराणसी) तथा इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में निरन्तर शिक्षण, शोध एवं भाषा-सर्वेक्षण का कार्य किया। आपने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञानी के रूप में ख्याति अर्जित की। प्रो. सिंह का काशी के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा है। दक्षिण भारत तथा फ़्रांस और अमेरिका में भी प्रो. सिंह ने काशी के प्रति लोगों की भावना को देखा और समझा। तभी से आपकी इच्छा थी कि काशी पर एक सर्वांगीण पुस्तक लिखें। यह पुस्तक उनकी दीर्घकालीन सोच और अनुभव का परिणाम है। प्रकाशन : आपकी समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, अनुवाद-विज्ञान एवं अन्य भाषा शिक्षण पर कई पुस्तकें प्रकाशित है : समसामयिक हिन्दी कविता, व्यावसायिक हिन्दी, भाषा का संसार, पाठ-विश्लेषण, अनुवाद का व्यापक परिप्रेक्ष्य, अन्य भाषा शिक्षण के बृहत्तर सन्दर्भ, भाषा साहित्य और संस्कृति शिक्षण, हिन्दी भाषा चिन्तन, कविता पाठ विमर्श, बनवासी बैगा : जीवन-गाथा। प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव के लेखों की तीन पुस्तकों का सह-सम्पादन : भाषा का समाजशास्त्र (डॉ. महेन्द्र के साथ), अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान (डॉ. सूरजभान सिंह के साथ) और साहित्य का भाषिक चिन्तन (डॉ. नामवर सिंह के साथ)। इनके अतिरिक्त कई आलेख एवं शोधपत्र प्रकाशित। रुचि के क्षेत्र : आप हिन्दी के सृजनात्मक साहित्य, उर्दू साहित्य, हिन्दी में अनूदित साहित्य, सिनेमा, संगीत, कला और भाषा के अभिव्यक्ति-पक्ष में रुचि रखते हैं। विशेष : पिछले दस वर्षों से आप भारत के सात राज्यों में निवास कर रहे आदिवासी समुदायों की भाषा, संस्कृति और उनके परम्परागत ज्ञान के संरक्षण के कार्य में लगे हुए हैं। विभिन्न आदिवासी समुदायों पर केन्द्रित शब्दकोश, व्याकरण, चित्रावली और वनौषधियों की सूची तैयार करने का कार्य आपने किया है। इनसे सम्बन्धित आपकी एकाधिक पुस्तकें इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय जन विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित की जा चुकी हैं। सम्प्रति : अवकाश प्राप्त। स्वतन्त्र अध्ययन एवं लेखन।

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