Save: 25%
Save: 1%
Aadigram Upakhayan
Publisher:
| Author:
| Language:
| Format:
Publisher:
Author:
Language:
Format:
₹200 Original price was: ₹200.₹199Current price is: ₹199.
Save: 1%
Out of stock
Receive in-stock notifications for this.
Ships within:
Out of stock
ISBN:
Page Extent:
आदिग्राम उपाख्यान –
नयी सदी में उभरे कतिपय महत्त्वपूर्ण कथाकारों में से एक कुणाल सिंह का यह पहला उपन्यास है। अपने इस पहले ही उपन्यास में कुणाल ने इस मिथ को समूल झुठलाया है कि आज की पीढ़ी नितान्त ग़ैर-राजनीतिक पीढ़ी है। अपने गहनतम अर्थों में ‘आदिग्राम उपाख्यान’ एक निर्भीक राजनीतिक उपन्यास है।
यह ग़ुस्से में लिखा गया उपन्यास है—ऐसा ग़ुस्सा, जो एक विराट मोहभंग के बाद रचनाकार की लेखकी में घर कर जाता है। इस उपन्यास के पन्ने-दर-पन्ने इसी ग़ुस्से को पोसते-पालते हैं। नब्बे के बाद भारतीय राजनीति में अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, आइडियोलॉजी का ह्रास, लालफ़ीताशाही आदि का जो बोलबाला दिखता है, उसके प्रति रचनाकार ग़ुस्से से भरा हुआ है। लेकिन यहाँ यह भी जोड़ना चाहिए कि यह ग़ुस्सा अकर्मक कतई नहीं है। सबकुछ को नकारकर छुट्टी पा लेने का रोमांटिक भाव इसमें हरगिज़ नहीं, और न ही किसी सुरक्षित घेरे में रहकर फ़ैसला सुनाने की इन्नोसेंसी यहाँ है। गो जब हम कहते हैं कि किसी भी पार्टी या विचारधारा में हमारा विश्वास नहीं, तो इसे परले दर्जे के एक पोलिटिकल स्टैंड के रूप में ही लेना चाहिए। इधर के कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल के वामपन्थ में आये विचलनों पर उँगली रखते हुए कुणाल सिंह को देखकर हमें बारहाँ यह दिख जाता है कि वे ख़ुद कितने कट्टर वामपन्थी हैं।
कुणाल की लेखनी का जादू यहाँ अपने उत्कर्ष पर है। अपूर्व शिल्प और भाषा को बरतने का एक ख़ास ढब कुणाल ने अर्जित किया है, जिसका आस्वाद यहाँ पहले की निस्बत अधिक सान्द्र है। यहाँ यथार्थ की घटनात्मक विस्तृति के साथ-साथ किंचित स्वैरमूलक और संवेदनात्मक उत्खनन भी है। कहें, कुणाल ने यथार्थ के थ्री डाइमेंशनल स्वरूप को पकड़ा है। कई बार घटनाओं की आवृत्ति होती है, लेकिन हर बार के दोहराव में एक अन्य पहलू जुड़कर कथा को एक नया रुख़ दे देता है। कुणाल ज़बर्दस्त क़िस्सागो हैं और फ़ैंटेसी की रचना में उस्ताद। लगभग दो सौ पृष्ठों के इस उपन्यास में अमूमन इतने ही पात्र हैं, लेकिन कथाक्रम पूर्णतः अबाधित है। बंगाल के गाँव और गँवई लोगों का एक ख़ास चरित्र भी यहाँ निर्धारित होता है, बिना आंचलिकता का ढोल पीटे। आश्चर्य नहीं कि इस उपन्यास से गुज़रने के बाद बाघा, दक्खिना, हराधन, भागी मण्डल, गुलाब, पंचानन बाबू, रघुनाथ जैसे पात्रों से ऐसा तआरुफ़ हो कि वे पाठकों के ज़हन में अपने लिए एक कोना सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित कर लें। संक्षेप में एक स्वागतयोग्य उपन्यास निश्चित रूप से वर्तमान युवा पीढ़ी के लेखन में एक सार्थक हस्तक्षेप डालने वाली कृति।
आदिग्राम उपाख्यान –
नयी सदी में उभरे कतिपय महत्त्वपूर्ण कथाकारों में से एक कुणाल सिंह का यह पहला उपन्यास है। अपने इस पहले ही उपन्यास में कुणाल ने इस मिथ को समूल झुठलाया है कि आज की पीढ़ी नितान्त ग़ैर-राजनीतिक पीढ़ी है। अपने गहनतम अर्थों में ‘आदिग्राम उपाख्यान’ एक निर्भीक राजनीतिक उपन्यास है।
यह ग़ुस्से में लिखा गया उपन्यास है—ऐसा ग़ुस्सा, जो एक विराट मोहभंग के बाद रचनाकार की लेखकी में घर कर जाता है। इस उपन्यास के पन्ने-दर-पन्ने इसी ग़ुस्से को पोसते-पालते हैं। नब्बे के बाद भारतीय राजनीति में अपराधीकरण, भ्रष्टाचार, आइडियोलॉजी का ह्रास, लालफ़ीताशाही आदि का जो बोलबाला दिखता है, उसके प्रति रचनाकार ग़ुस्से से भरा हुआ है। लेकिन यहाँ यह भी जोड़ना चाहिए कि यह ग़ुस्सा अकर्मक कतई नहीं है। सबकुछ को नकारकर छुट्टी पा लेने का रोमांटिक भाव इसमें हरगिज़ नहीं, और न ही किसी सुरक्षित घेरे में रहकर फ़ैसला सुनाने की इन्नोसेंसी यहाँ है। गो जब हम कहते हैं कि किसी भी पार्टी या विचारधारा में हमारा विश्वास नहीं, तो इसे परले दर्जे के एक पोलिटिकल स्टैंड के रूप में ही लेना चाहिए। इधर के कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल के वामपन्थ में आये विचलनों पर उँगली रखते हुए कुणाल सिंह को देखकर हमें बारहाँ यह दिख जाता है कि वे ख़ुद कितने कट्टर वामपन्थी हैं।
कुणाल की लेखनी का जादू यहाँ अपने उत्कर्ष पर है। अपूर्व शिल्प और भाषा को बरतने का एक ख़ास ढब कुणाल ने अर्जित किया है, जिसका आस्वाद यहाँ पहले की निस्बत अधिक सान्द्र है। यहाँ यथार्थ की घटनात्मक विस्तृति के साथ-साथ किंचित स्वैरमूलक और संवेदनात्मक उत्खनन भी है। कहें, कुणाल ने यथार्थ के थ्री डाइमेंशनल स्वरूप को पकड़ा है। कई बार घटनाओं की आवृत्ति होती है, लेकिन हर बार के दोहराव में एक अन्य पहलू जुड़कर कथा को एक नया रुख़ दे देता है। कुणाल ज़बर्दस्त क़िस्सागो हैं और फ़ैंटेसी की रचना में उस्ताद। लगभग दो सौ पृष्ठों के इस उपन्यास में अमूमन इतने ही पात्र हैं, लेकिन कथाक्रम पूर्णतः अबाधित है। बंगाल के गाँव और गँवई लोगों का एक ख़ास चरित्र भी यहाँ निर्धारित होता है, बिना आंचलिकता का ढोल पीटे। आश्चर्य नहीं कि इस उपन्यास से गुज़रने के बाद बाघा, दक्खिना, हराधन, भागी मण्डल, गुलाब, पंचानन बाबू, रघुनाथ जैसे पात्रों से ऐसा तआरुफ़ हो कि वे पाठकों के ज़हन में अपने लिए एक कोना सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित कर लें। संक्षेप में एक स्वागतयोग्य उपन्यास निश्चित रूप से वर्तमान युवा पीढ़ी के लेखन में एक सार्थक हस्तक्षेप डालने वाली कृति।
About Author
Reviews
There are no reviews yet.
Related products
BUNI HUI RASSI
Save: 0%
Tilak
Save: 35%
Nainan Mein Aan-Baan I नैनन में आन-बान
Save: 25%
HAMARA SAMVIDHAN BY SUBHASH KASHYAP HINDI
Save: 5%
White Nights । व्हाइट नाइट्स
Save: 1%
Godavari: Aashcharya aur gyaan ki nadi
Save: 1%
Saryu: Vishnu ke aansuon se prakat hui nadi
Save: 1%
Yuddh Aur Shanti (1-4) | युद्ध और शान्ति (1-4)
Save: 30%
Dravida Rajneeti : Periyar Se Jayalalithaa Tak | द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक
Save: 20%
Dhuadhar । धुआँधार
Save: 30%
Days at the Morisaki Bookshop | मोरीसाकी बुकशॉप के खुशनुमा दिन
Save: 30%
Wife Swapping
Save: 20%
RELATED PRODUCTS
Aakhiri Ghari
Save: 35%
Andhere Mein Jalta Ek Chirag
Save: 20%
Baavni Imli
Save: 20%
Barakhadi
Save: 20%
Bharat Bharti
Save: 35%
Bharat KI Sarawat Sadhana
Save: 30%
Bharat KI Sarawat Sadhana
Save: 25%
BUNI HUI RASSI
Save: 0%
Congress House
Save: 20%
Dhuadhar । धुआँधार
Save: 30%
Ganga: Teenon lokon mein pravahit hone wali nadi
Save: 1%
Godavari: Aashcharya aur gyaan ki nadi
Save: 1%
HAMARA SAMVIDHAN BY SUBHASH KASHYAP HINDI
Save: 5%
Huma Ka Pankh
Save: 20%
Jaago Maa / जागो माँ
Save: 0%
Jaago Maa / जागो माँ
Save: 10%
Jeevan Samvad-3
Save: 20%
Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya: Andal
Save: 20%
Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya: Namdev
Save: 20%
Kautuk
Save: 0%
Kinaya
Save: 20%
Main Barbad Hona Chahti Hoon | मैं बर्बाद होना चाहती हूँ
Save: 20%
Main Nastik Kyon Hoon?
Save: 20%
Mantra-Viplav
Save: 25%
Meri Jail Diary
Save: 20%
Mirza Galib Ke Mashur Sheron Shayri
Save: 10%
Nainan Mein Aan-Baan I नैनन में आन-बान
Save: 25%
Narmada: Shiv ke paseene se utpann hui nadi
Save: 1%
Premchand Ki Hindu-Muslim Sadbhav Kathayen
Save: 20%
Premchand Ki Stree Kathayen
Save: 20%
Roshani, Chhipkali Aur Patanga । रोशनी, छिपकली और पतंगा
Save: 20%
Saraswati: Vah nadi jo bahna band ho gayi
Save: 1%
Shayari Sadabahar: Khushboo-Sa Bikharna Mera
Save: 20%
Shayari Sadabahar: Saye Se Mukhatib
Save: 20%
Shayari Sadabahar: Tumhare Baare Mein Keh Raha Tha
Save: 20%
Silwaton Bhari Rooh
Save: 20%
Ucchatar Arthik Siddhanth
Save: 15%
Upar Baitha Ek Nithalla
Save: 20%
Vastunisht Bharatiya Ithihas evam rashtriya Andolan 3rd edition (Hindi)
Save: 25%
White Nights । व्हाइट नाइट्स
Save: 1%
Wife Swapping
Save: 20%
Wife Swapping
Save: 25%
Yamuna: Manoram leelaon se judi nadi
Save: 1%
Yuddh Aur Shanti (1-4) | युद्ध और शान्ति (1-4)
Save: 30%
Zinda Rehne Ki Zid
Save: 20%
अमृत कुम्भ: हिन्दू भाव का मंगल कलश I Amrit Kumbh: Hindu Bhav Ka Mangal Kalash
Save: 30%
विसर्जन (उपन्यास) — राजू शर्मा
Save: 20%
हृदय दीप तथा अन्य चयनित कहानियाँ I Heart Lamp Hindi
Save: 20%

Reviews
There are no reviews yet.