Suryakant Tripathi Nirala
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म 21 फरवरी 1896 को वसंत पंचमी के दिन महिषादल, बंगाल (अब पश्चिम बंगाल) में हुआ था। उनका जन्मदिन वसंत पंचमी को ही मानते थे। उन्होंने महिषादल हाई स्कूल में शिक्षा प्राप्त की, लेकिन पारंपरिक शिक्षा पद्धति में उनकी रुचि नहीं थी। बाद में उन्होंने बंगाली माध्यम से शिक्षा प्राप्त की।हाई स्कूल की पढ़ाई के बाद, उन्होंने घर पर रहकर ही संस्कृत और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं में महारत हासिल कीवे श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर से गहरे प्रभावित थे।
15 वर्ष की आयु में उनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ था, जो रायबरेली जिले के पंडित रामदयाल की पुत्री थीं।मनोहरा देवी ने संगीत का अभ्यास किया और हिंदी सीखकर हिंदी में कविता लिखना शुरू किया।
साहित्यिक जीवन:
- साहित्यिक शुरुआत: उन्होंने 1916 में “जूही की कली” नामक कविता से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की।
- छायावाद के स्तंभ: वे छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उनकी रचनाओं में प्रतीकात्मकता, कल्पनाशीलता और भावनाओं की तीव्रता देखने को मिलती है।
- विविध विधाएं: उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, निबंध, नाटक, और आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में रचनाएं प्रस्तुत कीं।
- प्रमुख रचनाएं:
- काव्य संग्रह: अनामिका, परिमल, गीतिका, अणिमा, बेला, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, गीत कुंज
- उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरुपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा, चोटी की पकड़, काले कारनामे, चमेली, इंदुलेखा
- कहानी संग्रह: लिली, सखी, सुकुल की बीवी, चतुरी चमार, देवी
- निबंध संग्रह: रवींद्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह
भाषा और शैली:
- भाषा: उन्होंने खड़ी बोली के साथ-साथ अवधी, ब्रजभाषा, और संस्कृत भाषा का भी प्रयोग किया।
- शैली: उनकी भाषा में गीतात्मकता, प्रतीकात्मकता, कल्पनाशीलता और भावनाओं की तीव्रता देखने को मिलती है।
- विषय वस्तु: उनकी रचनाओं में प्रेम, रहस्यवाद, प्रकृति, दर्शन, सामाजिक यथार्थ, और राष्ट्रीय चेतना जैसे विषयों का चित्रण मिलता है।
पुरस्कार एवं सम्मान:
- पद्म भूषण (1952)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) – “आत्मकथा”
- भारत भारती (1962)
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