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अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान

Publisher:
Shubhada Prakashan Jodhpur
| Author:
Mohanlal Gupta
| Language:
Hindi
| Format:
Paperback
Publisher:
Shubhada Prakashan Jodhpur
Author:
Mohanlal Gupta
Language:
Hindi
Format:
Paperback

Original price was: ₹200.Current price is: ₹199.

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12-15 Days

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ISBN:
Category:
Page Extent:
110

जिन चौहानों के भय से चंदेलों, गाहड़वालों तथा चौलुक्यों को नींद नहीं आती थी, जिन चौहानों की मित्रता के लिए प्रतिहार, परमार, तोमर एवं गुहिल लालायित रहते थे, जिन चौहानों ने अरब, सिंध, गजनी एवं गोर के आक्रांताओं को छः शताब्दियों तक भारत-भूमि से दूर रखा था, जिन चौहानों के राज्य में दिल्ली और हांसी छोटी सी जागीरें थीं, उन्हीं चौहानों का राजा था पृथ्वीराज चौहान। वह उत्तर भारत के विशाल मैदानों का स्वामी था। पूर्वी पंजाब से लेकर, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश के विभिन्न भागों एवं उत्तर प्रदेश के कन्नौज तक के क्षेत्र उसके अधीन थे। उस प्रतापी हिन्दू-सम्राट को गजनी के आक्रांता मुहम्मद गौरी ने तराइन के मैदान में छल से पकड़ लिया और उसकी आंखें फोड़कर किले में कैद कर लिया। तराइन से पहले और तराइन के बाद, आखिर हुआ क्या था! जानने के लिए पढ़िए यह रोचक और विश्वसनीय पुस्तक – सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता की लेखनी से!

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Description

जिन चौहानों के भय से चंदेलों, गाहड़वालों तथा चौलुक्यों को नींद नहीं आती थी, जिन चौहानों की मित्रता के लिए प्रतिहार, परमार, तोमर एवं गुहिल लालायित रहते थे, जिन चौहानों ने अरब, सिंध, गजनी एवं गोर के आक्रांताओं को छः शताब्दियों तक भारत-भूमि से दूर रखा था, जिन चौहानों के राज्य में दिल्ली और हांसी छोटी सी जागीरें थीं, उन्हीं चौहानों का राजा था पृथ्वीराज चौहान। वह उत्तर भारत के विशाल मैदानों का स्वामी था। पूर्वी पंजाब से लेकर, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्यप्रदेश के विभिन्न भागों एवं उत्तर प्रदेश के कन्नौज तक के क्षेत्र उसके अधीन थे। उस प्रतापी हिन्दू-सम्राट को गजनी के आक्रांता मुहम्मद गौरी ने तराइन के मैदान में छल से पकड़ लिया और उसकी आंखें फोड़कर किले में कैद कर लिया। तराइन से पहले और तराइन के बाद, आखिर हुआ क्या था! जानने के लिए पढ़िए यह रोचक और विश्वसनीय पुस्तक – सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. मोहनलाल गुप्ता की लेखनी से!

About Author

डॉ. मोहनलाल गुप्ता एक प्रतिष्ठित भारतीय साहित्यकार हैं। वे शब्दों के संवेदनशील शिल्पकार हैं। व्यंग्य, नाटक, कविता, ग़ज़ल और हिंदी लघु कहानियों के लेखन से लेकर विभिन्न दैनिक पत्रों में नियमित स्तंभकार के रूप में लेखन तक, डॉ. मोहनलाल गुप्ता को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं। वे भाषाओं के क्षेत्र में अद्वितीय प्रतिभा के धनी हैं। शब्दों की दुनिया के प्रति उनकी संवेदनशीलता अत्यंत विशिष्ट है। एक कुशल अभिव्यक्तिकार होने के साथ-साथ वे उच्च भावनात्मक बुद्धिमत्ता से भी संपन्न हैं। उन्होंने अब तक सात दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना की है, जिनमें शब्द एवं भारतीय इतिहास, व्यंग्य, नाटक, कविता, ग़ज़ल, उपन्यास, लघु कहानियाँ और सांस्कृतिक अध्ययन शामिल हैं।

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