Madhav Hada: Set of 4 | Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya : Baba Farid | Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya : Narsi Mehta | Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya : Akka Mahadevi | Kaaljayi Kavi Aur Unka Kavya : Laldyad

Publisher:
Rajpal and Sons
| Author:
Madhav Hada
| Language:
Hindi
| Format:
Omnibus/Box Set (Paperback)
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Rajpal and Sons
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Madhav Hada
Language:
Hindi
Format:
Omnibus/Box Set (Paperback)

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448

कालजयी कवि और उनका काव्य

1. बाबा फ़रीद

इस पुस्तक में हिन्दी के अमर कवियों की श्रेष्ठतम रचनाओं का संकलन किया गया है, जिसमें उनके काव्य का विस्तृत विवेचन भी शामिल है।

बाबा फ़रीद सूफ़ी-संत परंपरा से जुड़े एक महत्वपूर्ण कवि थे, जिनका मध्यकालीन भक्ति साहित्य में विशिष्ट स्थान है। उनकी महत्ता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि वे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के गुरु थे और उनकी 130 रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं। वे न केवल भक्ति में विश्वास रखते थे, बल्कि नैतिकता, निर्मलता और आचरण की पवित्रता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। उनकी वाणी पंजाबी (सरायकी) भाषा में है, जिसमें संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, सिंधी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रभाव दिखाई देता है।

एक बार किसी व्यक्ति ने उन्हें कैंची भेंट की, तो उन्होंने कहा, “तुम मुझे कैंची नहीं, सुई दो। मैं काटने की जगह जोड़ता हूँ।” यही जोड़ने की भावना बाबा फ़रीद की सबसे बड़ी शिक्षा है, जिसकी आज के समय में भी बहुत आवश्यकता है।

2. नरसी मेहता

यह संकलन हिन्दी के कालजयी कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का संग्रह है, जिसमें उनके काव्य का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है।

नरसी मेहता, जिन्हें नरसी भगत के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर भारत के लोकप्रिय संत-कवि थे। उनकी कविताएँ आज भी लोगों को कंठस्थ हैं। उनका जन्म गुजरात में हुआ था, लेकिन उनकी ख्याति राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली।

उनके काव्य में दो विशेषताएँ प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं—पहली, वे पूरी तरह से लोक-कवि हैं। भारतीय साहित्य में उनके जैसा लोक-सचेत भक्त कवि दूसरा कोई नहीं है। उनकी रचनाओं में बार-बार सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती है। दूसरी विशेषता यह है कि उनके काव्य में श्रृंगार और भक्ति दोनों का गहरा समावेश है। वे स्वयं को भक्त अधिक और कवि कम मानते थे, लेकिन उनकी कविताएँ सहज और अनायास रूप से उच्च काव्य स्तर तक पहुँच जाती थीं। उनकी भाषा में गुजराती, मराठी और राजस्थानी का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।

3. अक्क महादेवी

इस पुस्तक में हिन्दी के महान कवियों की चुनिंदा और श्रेष्ठतम रचनाओं का संकलन है, जो उनके काव्य के विस्तृत विवेचन के साथ प्रस्तुत किया गया है।

अक्क महादेवी 12वीं सदी की कर्नाटक की एक विशिष्ट भक्त-कवयित्री थीं। वे परम शिवभक्त थीं और उनके द्वारा लिखे गए कन्नड़ भाषा के 434 वचन भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण हैं। उस समय के कन्नड़ समाज में वर्ण, वर्ग, जाति और लिंग भेद की गहरी जड़ें थीं, जिनका अक्क महादेवी ने विरोध किया। उन्होंने समाज के बनाए नियमों के विपरीत एक साध्वी का जीवन अपनाया। उनका मानना था कि भौतिक वस्तुओं का त्याग ही सच्ची भक्ति है, और इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने अपने वस्त्रों तक का त्याग कर दिया।

अक्क महादेवी का नाम भक्त-संत कवियों में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कन्नड़ भाषा से बाहर उनके वचनों को बहुत कम लोग जानते हैं। यह पुस्तक उनके 137 वचनों का सरल हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करती है, जिससे पाठक उनकी आध्यात्मिक विचारधारा को गहराई से समझ सकें।

4. ललद्यद

इस पुस्तक में हिन्दी के कालजयी कवियों की प्रमुख रचनाओं को संकलित किया गया है, जिसमें उनके काव्य का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

ललद्यद, जिन्हें ललेश्वरी और ललयोगेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, 14वीं सदी की कश्मीर की महान भक्त-कवयित्री थीं। उनका जन्म 1317-1320 ई. के बीच हुआ था। बचपन में ही उनका विवाह हो गया था, लेकिन सांसारिक बंधनों ने उनके आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित नहीं किया। वे शैव दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थीं और उनकी कविताओं को ‘वाख’ कहा जाता है। इन वाखों में न केवल ईश्वर के प्रति भक्ति भाव झलकता है, बल्कि उनके जीवन के संघर्षों की भी झलक मिलती है।

अक्क महादेवी की तरह ही ललद्यद ने भी सांसारिक बंधनों का त्याग किया और अपनी भक्ति साधना में लीन रहीं। इस संकलन में उनके 178 वाखों का सरल हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक उनकी गहरी आध्यात्मिकता को समझ सकें।


यह “कालजयी कवि और उनका काव्य” श्रृंखला भारतीय भक्ति साहित्य के अनमोल कवियों की कृतियों को हिन्दी पाठकों के लिए सहज रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है।

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कालजयी कवि और उनका काव्य

1. बाबा फ़रीद

इस पुस्तक में हिन्दी के अमर कवियों की श्रेष्ठतम रचनाओं का संकलन किया गया है, जिसमें उनके काव्य का विस्तृत विवेचन भी शामिल है।

बाबा फ़रीद सूफ़ी-संत परंपरा से जुड़े एक महत्वपूर्ण कवि थे, जिनका मध्यकालीन भक्ति साहित्य में विशिष्ट स्थान है। उनकी महत्ता इस बात से भी प्रमाणित होती है कि वे हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के गुरु थे और उनकी 130 रचनाएँ गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित हैं। वे न केवल भक्ति में विश्वास रखते थे, बल्कि नैतिकता, निर्मलता और आचरण की पवित्रता को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानते थे। उनकी वाणी पंजाबी (सरायकी) भाषा में है, जिसमें संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, सिंधी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रभाव दिखाई देता है।

एक बार किसी व्यक्ति ने उन्हें कैंची भेंट की, तो उन्होंने कहा, “तुम मुझे कैंची नहीं, सुई दो। मैं काटने की जगह जोड़ता हूँ।” यही जोड़ने की भावना बाबा फ़रीद की सबसे बड़ी शिक्षा है, जिसकी आज के समय में भी बहुत आवश्यकता है।

2. नरसी मेहता

यह संकलन हिन्दी के कालजयी कवियों की उत्कृष्ट रचनाओं का संग्रह है, जिसमें उनके काव्य का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया है।

नरसी मेहता, जिन्हें नरसी भगत के नाम से भी जाना जाता है, उत्तर भारत के लोकप्रिय संत-कवि थे। उनकी कविताएँ आज भी लोगों को कंठस्थ हैं। उनका जन्म गुजरात में हुआ था, लेकिन उनकी ख्याति राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली।

उनके काव्य में दो विशेषताएँ प्रमुख रूप से दिखाई देती हैं—पहली, वे पूरी तरह से लोक-कवि हैं। भारतीय साहित्य में उनके जैसा लोक-सचेत भक्त कवि दूसरा कोई नहीं है। उनकी रचनाओं में बार-बार सामाजिक सरोकारों की झलक मिलती है। दूसरी विशेषता यह है कि उनके काव्य में श्रृंगार और भक्ति दोनों का गहरा समावेश है। वे स्वयं को भक्त अधिक और कवि कम मानते थे, लेकिन उनकी कविताएँ सहज और अनायास रूप से उच्च काव्य स्तर तक पहुँच जाती थीं। उनकी भाषा में गुजराती, मराठी और राजस्थानी का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।

3. अक्क महादेवी

इस पुस्तक में हिन्दी के महान कवियों की चुनिंदा और श्रेष्ठतम रचनाओं का संकलन है, जो उनके काव्य के विस्तृत विवेचन के साथ प्रस्तुत किया गया है।

अक्क महादेवी 12वीं सदी की कर्नाटक की एक विशिष्ट भक्त-कवयित्री थीं। वे परम शिवभक्त थीं और उनके द्वारा लिखे गए कन्नड़ भाषा के 434 वचन भक्ति और प्रेम से परिपूर्ण हैं। उस समय के कन्नड़ समाज में वर्ण, वर्ग, जाति और लिंग भेद की गहरी जड़ें थीं, जिनका अक्क महादेवी ने विरोध किया। उन्होंने समाज के बनाए नियमों के विपरीत एक साध्वी का जीवन अपनाया। उनका मानना था कि भौतिक वस्तुओं का त्याग ही सच्ची भक्ति है, और इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने अपने वस्त्रों तक का त्याग कर दिया।

अक्क महादेवी का नाम भक्त-संत कवियों में बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन कन्नड़ भाषा से बाहर उनके वचनों को बहुत कम लोग जानते हैं। यह पुस्तक उनके 137 वचनों का सरल हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करती है, जिससे पाठक उनकी आध्यात्मिक विचारधारा को गहराई से समझ सकें।

4. ललद्यद

इस पुस्तक में हिन्दी के कालजयी कवियों की प्रमुख रचनाओं को संकलित किया गया है, जिसमें उनके काव्य का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

ललद्यद, जिन्हें ललेश्वरी और ललयोगेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है, 14वीं सदी की कश्मीर की महान भक्त-कवयित्री थीं। उनका जन्म 1317-1320 ई. के बीच हुआ था। बचपन में ही उनका विवाह हो गया था, लेकिन सांसारिक बंधनों ने उनके आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित नहीं किया। वे शैव दर्शन से अत्यधिक प्रभावित थीं और उनकी कविताओं को ‘वाख’ कहा जाता है। इन वाखों में न केवल ईश्वर के प्रति भक्ति भाव झलकता है, बल्कि उनके जीवन के संघर्षों की भी झलक मिलती है।

अक्क महादेवी की तरह ही ललद्यद ने भी सांसारिक बंधनों का त्याग किया और अपनी भक्ति साधना में लीन रहीं। इस संकलन में उनके 178 वाखों का सरल हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत किया गया है, जिससे पाठक उनकी गहरी आध्यात्मिकता को समझ सकें।


यह “कालजयी कवि और उनका काव्य” श्रृंखला भारतीय भक्ति साहित्य के अनमोल कवियों की कृतियों को हिन्दी पाठकों के लिए सहज रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है।

About Author

माधव हाड़ा एक प्रसिद्ध लेखक, आलोचक और शिक्षाविद् हैं, जो खासतौर पर मध्यकालीन साहित्य और इतिहास के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन्होंने आधुनिक साहित्य, मीडिया और संस्कृति पर भी गहराई से काम किया है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक 'पचरंग चोला पहर सखी री' (2015) मीरांबाई के जीवन और समाज पर आधारित है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद 'Meera vs Meera' 2020 में प्रकाशित हुआ, जिसने काफी चर्चा बटोरी। इस रचना के लिए उन्हें 32वें बिहारी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। माधव हाड़ा ने मीरांबाई से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक 'वैदहि ओखद जाणे: मीरां और पश्चिमी ज्ञान मीमांसा' लिखी, जिसमें उन्होंने मीरां के जीवन और काव्य को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। इसके अलावा, उनकी पुस्तक 'पद्मिनी: इतिहास और कथा-काव्य की जुगलबंदी' भी काफी चर्चित रही, जिसे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला ने प्रकाशित किया। उनके गहन शोध और लेखन ने मध्यकालीन साहित्य और इतिहास की समझ को समृद्ध किया है।

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